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थायराइड ग्रंथि (gland) गर्दन के आगे स्थित एक छोटी सी ग्रंथि है। जो हमारे शरीर के मेटाबॉलिज्म (Metabolism), ग्रोथ और ब्रेन डेवलपमेंट को नियंत्रित करने वाले हार्मोन (टी 3, टी 4) बनाती है। अगर यह ग्रंथि सही मात्रा में हार्मोन नहीं बनाती (हाइपोथायरायडिज्म) या जरूरत से ज्यादा बनाती है (हाइपरथायरायडिज्म) तो बच्चों में कई गंभीर समस्याएं होती हैं। जैसे शारीरिक विकास में रुकावट, मानसिक विकास में देरी और पढ़ाई में ध्यान की कमी होती है।
इसलिए यह जानना बेहद जरूरी है कि बच्चों में थायराइड क्यों होता है, इसका इलाज़ क्या हैं। बच्चों के थायराइड इलाज के लिए हॉस्पिटल नोएडा में संपर्क करें साथ ही समय रहते अपने बच्चो को स्वस्थ बनाएं।
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बच्चों में थायराइड क्यों होता है? (Why Thyroid Happens in Children)
थायराइड के बच्चों में लक्षण (Symptoms of Thyroid in Children)
बच्चों में थायराइड की बीमारी को कैसे पहचानें (How to Identify Thyroid Disease in Children)
बच्चों में थायराइड का इलाज – पीडियाट्रिक और नियोनेटोलॉजी गाइडलाइन (Treatment of Thyroid in Children)
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)
थायराइड की समस्या (Thyroid problem) बच्चों में जन्म से होती है या बाद में भी विकसित होती है। जन्मजात हाइपोथायरायडिज्म (congenital hypothyroidism) तब होता है, जब बच्चा बिना सक्रिय थायराइड ग्रंथि के जन्म लेता है या ग्रंथि पूरी तरह विकसित नहीं होती। बाद में होने वाला थायराइड (अधिग्रहित हाइपोथायरायडिज्म) कई कारणों से होता है। जैसे आयोडीन की कमी, ऑटोइम्यून डिजीज (हाशिमोटो थायरॉइडाइटिस) या संक्रमण से होता है। थायराइड का असर बच्चों की लंबाई, वजन, दिमागी विकास और पढ़ाई के प्रदर्शन पर सीधा पड़ता है।
बच्चों में थायराइड की समस्या दो मुख्य कारणों से होती है। पहला जन्मजात और दूसरा अधिग्रहीत। जन्मजात कारणों में थायराइड ग्रंथि का पूरी तरह विकसित न होना या न बनना, थायराइड हार्मोन के निर्माण में जेनेटिक दोष और गर्भावस्था के दौरान मां के शरीर में आयोडीन की कमी प्रमुख हैं। ऐसे मामलों में बच्चे के जन्म से ही थायराइड हार्मोन का स्तर कम होता है। जिससे शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित होता है। अधिग्रहीत कारणों में ऑटोइम्यून थायरॉयडिटिस (Autoimmune Thyroiditis) एक मुख्य वजह है। जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली थायराइड ग्रंथि पर हमला कर उसे क्षति पहुंचाती है।
इसके अलावा आयोडीन की कमी या अत्यधिक मात्रा, वायरल या बैक्टीरियल संक्रमण, रेडिएशन थेरेपी (Radiation Therapy) का प्रभाव, कुछ दवाओं के साइड इफेक्ट और पिट्यूटरी ग्लैंड (Pituitary Gland) की गड़बड़ी थायराइड की समस्या का कारण बनती है। समय पर पहचान और उपचार न होने पर बच्चों में थकान, वजन में बदलाव, ध्यान की कमी, पढ़ाई में कमजोरी, और विकास में रुकावट जैसी समस्याएं होती हैं। इसलिए बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर नजर रखना और थायराइड संबंधी लक्षण दिखने पर चिकित्सकीय जांच जरूरी है।
बच्चों में थायराइड के लक्षण इस बात पर निर्भर करते हैं कि वह हाइपोथायरायडिज्म यानी हार्मोन की कमी (Hormone deficiency) से पीड़ित हैं या हाइपरथायरायडिज्म यानी हार्मोन की अधिकता से।
शरीर में थायराइड हार्मोन का स्तर कम होना
चयापचय की गति धीमी पड़ना
वजन बढ़ना
सुस्ती और थकान
पढ़ाई में ध्यान न लगना
कब्ज की समस्या
त्वचा का रूखापन
ठंड ज्यादा लगना
बालों का झड़ना
शारीरिक विकास की गति धीमी होना
लंबे समय तक रहने पर ग्रोथ और मानसिक विकास पर असर
थायराइड हार्मोन का स्तर सामान्य से ज्यादा होना
मेटाबॉलिज्म का तेज हो जाना
वजन घटना
ज्यादा पसीना आना
घबराहट और चिड़चिड़ापन
दिल की धड़कन तेज होना
नींद न आना
हाथों का कांपना
ऊर्जा की असामान्य खपत
हृदय पर अतिरिक्त दबाव पड़ना
बच्चों में थायराइड की समस्या का अंदाजा कई शुरुआती संकेतों से लगा सकते है। जिन्हें नजरअंदाज करना भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनता है। अगर बच्चे का वजन या लंबाई उसकी उम्र के अनुसार कम या ज्यादा हो तो यह हार्मोनल असंतुलन का संकेत होता है। पढ़ाई या खेल-कूद में ध्यान न लगना, बार-बार थकान या कमजोरी महसूस करना थायराइड से जुड़े लक्षण हैं। गले के आगे गांठ या सूजन दिखना थायराइड ग्रंथि में असामान्यता का संकेत देता है। जिसे तुरंत जांच की जरूरत होती है।
इसके अलावा डॉक्टर द्वारा ग्रोथ चार्ट में गिरावट नोट करना इस बात का संकेत है कि बच्चे की शारीरिक वृद्धि प्रभावित होती है। जन्म के 48 घंटे के भीतर किए जाने वाले नवजात स्क्रीनिंग टेस्ट (Newborn Screening Tests) में अगर रिपोर्ट असामान्य आती है तो यह जन्मजात थायराइड समस्या का शुरुआती संकेत होता है। समय रहते जांच और उपचार शुरू करना जरूरी है। जिससे बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित न हो और वह सामान्य जीवन जी सके। थायराइड की समय पर पहचान न केवल जटिलताओं से बचाती है।
थायराइड की समस्या की पुष्टि के लिए डॉक्टर कई तरह के टेस्ट कराने की सलाह देते हैं। जिससे सही कारण और स्तर का पता लगाते हैं। सबसे आम टेस्ट है टीएसएच (थायरॉइड उत्तेजक हार्मोन) जो यह बताता है कि शरीर में थायराइड हार्मोन (thyroid hormone) का स्तर सामान्य है या नहीं।
इसके साथ ही मुफ्त टी 4 और मुफ्त टी 3 टेस्ट किए जाते हैं। जो थायराइड हार्मोन की सक्रिय मात्रा को मापते हैं और यह स्पष्ट करते हैं कि हार्मोन की कमी है या अधिकता का पता चलते हैं। अगर थायराइड की समस्या ऑटोइम्यून कारणों से हो रही है तो डॉक्टर थायराइड एंटीबॉडी परीक्षण कराने की सलाह देते हैं। जिससे इम्यून सिस्टम द्वारा थायराइड ग्रंथि पर हो रहे हमले का पता चलता है।
थायराइड की संरचना और उसमें मौजूद गांठ या सूजन देखने के लिए गर्दन का अल्ट्रासाउंड (Ultrasound) किया जाता है। वहीं जन्म के तुरंत बाद बच्चों में थायराइड की जांच के लिए नवजात शिशु की जांच टेस्ट जरूरी है। जिससे जन्मजात थायराइड विकार की समय पर पहचान हो सके। थायराइड की समस्या का पता शुरुआती स्तर पर लग जाए तो रोगी की सेहत को सुरक्षित रखा जा सकता है।
थायराइड की समस्या में उपचार उसके प्रकार के अनुसार तय किया जाता है। हाइपोथायरायडिज्म (थायराइड हार्मोन की कमी) के मामलों में डॉक्टर द्वारा निर्धारित डोज में लेवोथायरोक्सिन हार्मोन रिप्लेसमेंट (levothyroxine hormone replacement) दिया जाता है। जो शरीर में कमी पूरी करता है। इस दौरान नियमित ब्लड टेस्ट करवाना जरूरी है। जिससे हार्मोन का स्तर देखकर दवा की डोज को एडजस्ट किया जा सके।
वहीं हाइपरथायरायडिज्म (थायराइड हार्मोन की अधिकता) में एंटी-थायरॉइड दवाएं जैसे मेथिमाजोल दी जाती हैं। जो हार्मोन का अत्यधिक उत्पादन कम करती हैं। कुछ मामलों में खासकर बड़ों में रेडियोआयोडीन थेरेपी का इस्तेमाल किया जाता है। जिससे थायराइड ग्रंथि की सक्रियता घटाई जा सके। दवाओं के साथ-साथ लाइफस्टाइल और डाइट में सुधार भी जरूरी है।
इसके लिए पर्याप्त मात्रा में आयोडीन युक्त नमक का सेवन करना चाहिए। जिससे थायराइड हार्मोन के निर्माण में कमी न आए। आहार में प्रोटीन, हरी पत्तेदार सब्जियां और मौसमी फल शामिल करना लाभकारी है। वहीं पैकेज्ड और प्रोसेस्ड फूड से बचना चाहिए। क्योंकि इनमें मौजूद रसायन और अतिरिक्त नमक थायराइड के संतुलन को बिगाड़ते हैं। संतुलित खानपान से थायराइड को नियंत्रण में रख सकते हैं।
थायराइड या अन्य हार्मोन संबंधी समस्याओं के मामले में बच्चों के इलाज के लिए सही विशेषज्ञ का चयन बेहद महत्वपूर्ण है। पीडियाट्रिक एंडोक्राइनोलॉजिस्ट बच्चों में हार्मोन से जुड़ी बीमारियों के विशेषज्ञ होते हैं और जटिल मामलों में इलाज करते हैं। यदि बच्चे में थायराइड के शुरुआती लक्षण दिख रहे हों तो सबसे पहले पीडियाट्रिशियन से संपर्क करना चाहिए। जो सामान्य चेकअप और प्राथमिक जांच करके स्थिति का आकलन करते हैं। फिर जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ के पास रेफर करता है।
यदि बच्चा नवजात है और जन्मजात थायराइड की आशंका हो तो नियोनेटोलॉजिस्ट का परामर्श लेना जरूरी है। क्योंकि वह नवजात शिशुओं की गंभीर और विशेष स्वास्थ्य स्थितियों का इलाज करने में प्रशिक्षित होते हैं। समय पर सही बच्चों के थायराइड विशेषज्ञ डॉक्टर से नोएडा में संपर्क करने से थायराइड जैसी समस्या का जल्द निदान और इलाज संभव है। जिससे बच्चे का विकास और स्वास्थ्य दोनों ही सुरक्षित होता है।
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बच्चों में थायराइड की समस्या आम नहीं होती। लेकिन अगर हो जाए तो समय पर पहचान और सही इलाज से बच्चा सामान्य जीवन जी सकता है। इसके लिए सबसे बड़ा बचाव है। बीमारी के कारणों को समझना और शुरुआती लक्षणों पर ध्यान देना। माता-पिता को बच्चों के ग्रोथ चार्ट, वजन और पढ़ाई में आने वाले बदलावों पर लगातार नजर रखनी चाहिए। क्योंकि यह बदलाव थायराइड की शुरुआती चेतावनी होते हैं। समय पर डॉक्टर से जांच और उपचार कराकर बच्चे के विकास और सेहत को सुरक्षित रख सकते हैं।
प्रश्न 1: क्या थायराइड बच्चों में जन्म से हो सकता है?
उत्तर: हां इसे जन्मजात थायराइड कहते हैं और यह नवजात शिशु की जांच से पता लगाया जा सकता है।
प्रश्न 2: क्या बच्चों में थायराइड का इलाज जीवनभर करना पड़ता है?
उत्तर: जन्मजात हाइपोथायराइडिज्म में अक्सर लंबे समय तक दवा लेनी पड़ती है। लेकिन कारण के अनुसार यह अस्थायी भी होता है।
प्रश्न 3: क्या डाइट से थायराइड कंट्रोल हो सकता है?
उत्तर: डाइट से सपोर्ट जरूर मिलता है। लेकिन दवा की जरूरत को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकता। इसलिए जीवनशैली पर नियंत्रण होता है।
प्रश्न 4: क्या थायराइड टेस्ट हर साल करवाना जरूरी है?
उत्तर: अगर बच्चे को थायराइड है या रिस्क फैक्टर है। तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित टेस्ट करवाना चाहिए। जिससे बीमारी का पता चल सके।
प्रश्न 5: क्या आयोडीन की कमी से ही थायराइड होता है?
उत्तर: नहीं आयोडीन की कमी एक कारण है। लेकिन ऑटोइम्यून डिजीज, जेनेटिक कारण और अन्य समस्याएं इसके जिम्मेदार होते हैं।