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क्रॉनिक किडनी डिजीज (Chronic Kidney Disease – CKD) एक दीर्घकालिक और प्रगतिशील बीमारी है, जिसमें किडनी धीरे-धीरे अपनी फिल्टरिंग क्षमता खो देती है। यह बीमारी अचानक नहीं होती, बल्कि सालों में धीरे-धीरे विकसित होती है, इसलिए अधिकांश मरीज शुरुआती अवस्था में इसे पहचान नहीं पाते। नोएडा में किडनी रोग विशेषज्ञ (Kidney specialist in Noida) उपलब्ध है। नोएडा में सीकेडी की समय पर जांच और इलाज से किडनी फेलियर को काफी हद तक रोका जा सकता है।
अधिक जानकारी या अपॉइंटमेंट के लिए कॉल करें: +91 9667064100
क्रॉनिक किडनी डिजीज (Chronic kidney disease) वह स्थिति है। जिसमें 3 महीने या उससे अधिक समय तक किडनी डैमेज बना रहता है। या जीएफआर 60 से कम होता है। जिससे किडनी की कार्यक्षमता धीरे-धीरे और स्थायी रूप से घटती है। यह स्थिति पूरी तरह रिवर्स नहीं होती, लेकिन सही समय पर इलाज, नियमित जांच और जीवनशैली में सुधार से इसकी प्रगति को काफी हद तक धीमा किया जा सकता है। इसी कारण नेफ्रोलॉजी में कहा जाता है कि किडनी को बचाने के लिए शुरुआती पहचान ही सबसे जरूरी है।
डायबिटीज में लंबे समय तक बढ़ा हुआ ब्लड शुगर किडनी की सूक्ष्म फिल्टरिंग यूनिट (ग्लोमेरुली) को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाता है। जिसके कारण सबसे पहले यूरिन में प्रोटीन आना शुरू होता है। समय के साथ जीएफआर लगातार घटता चला जाता है। यही वजह है कि डायबिटीज को क्रॉनिक किडनी डिजीज का लगभग 40–45% सबसे बड़ा कारण माना जाता है।
लगातार उच्च रक्तचाप किडनी की रक्त वाहिकाओं को धीरे-धीरे सख्त और संकुचित करता है। जिससे किडनी की फिल्टरिंग क्षमता कम होती है। परिणामस्वरूप अनियंत्रित ब्लड प्रेशर क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) और किडनी फेलियर दोनों का एक बड़ा कारण बन जाता है।
बार-बार होने वाले यूटीआई या पायलोनेफ्राइटिस किडनी के टिश्यू को धीरे-धीरे स्थायी नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे समय के साथ किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। खासकर महिलाओं व बच्चों में इसका जोखिम अधिक पाया जाता है।
लंबे समय तक पेनकिल, कुछ विशेष एंटीबायोटिक्स तथा बिना चिकित्सकीय निगरानी के ली जाने वाली आयुर्वेदिक या हर्बल दवाओं का सेवन किडनी पर अतिरिक्त दबाव डालता है। जिसके परिणामस्वरूप ड्रग-इंड्यूस्ड क्रोनिक किडनी डिजीज (Drug-induced chronic kidney disease) विकसित हो सकती है।
लंबे समय तक यूरिन का फ्लो बाधित रहने से किडनी पर लगातार दबाव बढ़ाता है। जिससे उसकी संरचना और कार्यक्षमता प्रभावित होती है और धीरे-धीरे किडनी खराब होने लगती है।
यदि परिवार में पहले से क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी), पॉलीसिस्टिक किडनी डिज़ीज़ या किडनी फेलियर (Kidney failure) का इतिहास रहा हो, तो जेनेटिक कारणों से व्यक्ति में किडनी रोग होने का जोखिम कई गुना बढ़ता है।
सीकेडी की सबसे खतरनाक बात यह है कि शुरुआत में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते है। जब लक्षण दिखते हैं, तब तक किडनी काफी हद तक डैमेज हो चुकी होती है।
बिना कारण थकान
ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई
हल्की सूजन (पैर, आंखों के नीचे)
रात में बार-बार पेशाब
पेशाब में झाग
भूख कम लगना
सीकेडी को जीएफआर (ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट) के आधार पर 5 स्टेज में बांटा गया है:
इसमें किडनी डैमेज मौजूद होता है। लेकिन किडनी का फंक्शन लगभग सामान्य रहता है। इस अवस्था में आमतौर पर कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते, इसलिए यह स्थिति केवल मेडिकल जांच के माध्यम से ही पता चलती है।
इसमें किडनी की कार्यक्षमता में हल्की गिरावट आ जाती है। लेकिन इस अवस्था में सही जीवनशैली बदलाव, डाइट कंट्रोल और नियमित निगरानी से बीमारी को प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है।
इसमें किडनी को मध्यम स्तर का नुकसान हो चुका होता है, जिसके कारण शरीर में एनीमिया, लगातार थकान और पैरों या चेहरे में सूजन जैसे लक्षण धीरे-धीरे दिखाई देने लगते हैं।
इसमें किडनी को गंभीर स्तर का डैमेज हो चुका होता है। इस चरण में किडनी की कार्यक्षमता काफी कम होती है। मरीज के लिए डायलिसिस की योजना बनाना तथा आगे के उपचार की तैयारी करना आवश्यक हो जाता है।
इसे किडनी फेलियर की अवस्था माना जाता है। जिसमें किडनी लगभग काम करना बंद कर देती है और मरीज की जान बचाने के लिए डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट (Kidney transplant) जैसे उपचार अनिवार्य हो जाते हैं।+
पेशाब बहुत कम या बंद
शरीर में अत्यधिक पानी भरना
सांस लेने में दिक्कत
सीने में दर्द
उल्टी, मतली
पोटैशियम बढ़ने से दिल की धड़कन रुकने का खतरा
सीकेडी का इलाज स्टेज-आधारित होता है:
शुरुआती स्टेज (1–3)
शुरुआती स्टेज (1–3) में उपचार का मुख्य उद्देश्य ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर को सख्ती से नियंत्रित करना है। नोएडा में सर्वश्रेष्ठ नेफ्रोलॉजी अस्पताल (Best Nephrology Hospitals in Noida) उपलब्ध है। किडनी पर सुरक्षित असर करने वाली किडनी-सेफ दवाइयों का उपयोग करना और रोग की प्रगति को धीमा करने के लिए डाइट में आवश्यक संशोधन करना होता है।
एडवांस स्टेज (4)
एडवांस स्टेज (4) में किडनी को गंभीर नुकसान हो चुका होता है, इसलिए इस चरण में नियमित नेफ्रोलॉजिस्ट के फॉलो-अप, डायलिसिस की तैयारी और भविष्य में उपचार के लिए वैस्कुलर एक्सेस की प्लानिंग अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
स्टेज 5
इसमें किडनी लगभग पूरी तरह से काम करना बंद कर देती है, इसलिए इस चरण में मरीज के लिए हेमोडायलिसिस या पेरिटोनियल डायलिसिस जैसी नियमित जीवनरक्षक प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है, और स्थायी समाधान के लिए किडनी ट्रांसप्लांट अनिवार्य हो जाता है।
रोज 2–3 लीटर पानी
नमक और शुगर सीमित
नियमित केएफटी जांच कराएं
धूम्रपान से दूरी
बिना डॉक्टर सलाह दवा न लें
साल में कम से कम एक बार किडनी जांच
फेलिक्स हॉस्पिटल नोएडा में सीकेडी के मरीजों के लिए एडवांस जांच, 24×7 डायलिसिस सुविधा, अनुभवी नेफ्रोलॉजिस्ट (Best Nephrologists In Noida), साथ ही किडनी बायोप्सी और ट्रांसप्लांट गाइडेंस जैसी संपूर्ण नेफ्रोलॉजी सेवाएं उपलब्ध हैं, जो मरीजों को हर स्तर पर विशेषज्ञ देखभाल सुनिश्चित करती हैं।
अपॉइंटमेंट के लिए संपर्क करें: +91 9667064100
क्रॉनिक किडनी डिज़ीज़ एक धीमी लेकिन खतरनाक बीमारी है। समय पर जांच, सही इलाज और जीवनशैली सुधार से किडनी फेलियर को टाला जा सकता है। किडनी बचाना है, तो आज ही जांच कराइए। इलाज में देरी नहीं करनी चाहिए। ऐसा करने से नुकसान हो सकता है।
प्रश्न 1. क्या सीकेडी पूरी तरह ठीक हो सकती है?
उत्तर: समय पर पहचान, दवाओं का सही उपयोग, जीवनशैली में सुधार और नियमित फॉलो-अप के जरिए इसके प्रगति को धीमा किया जा सकता है।
प्रश्न 2. सीकेडी का सबसे बड़ा कारण क्या है?
उत्तर: सीकेडी के सबसे आम और प्रमुख कारण डायबिटीज हैं। लंबे समय तक उच्च ब्लड शुगर किडनी की सूक्ष्म रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाता है।
प्रश्न 3. सीकेडी में डायलिसिस कब जरूरी होती है?
उत्तर: डायलिसिस की आवश्यकता तब होती है जब किडनी की कार्यक्षमता बहुत कम हो जाए, आमतौर पर स्टेज 4–5 (जीएफआर 30) में।
प्रश्न 4. क्या सीकेडी बिना लक्षण के हो सकती है?
उत्तर: हां, सीकेडी अक्सर शुरुआती स्टेज में बिना किसी स्पष्ट लक्षण के रहती है। मरीज सामान्य महसूस करते हैं। लेकिन किडनी धीरे-धीरे डैमेज हो रही होती है।
प्रश्न 5. सीकेडी से बचाव कैसे करें?
उत्तर: डायबिटीज और हाई BP को नियमित मॉनिटर करें। नमक, प्रोसेस्ड फूड और अत्यधिक प्रोटीन से परहेज करें। ताजे फल, सब्जियां और नियंत्रित प्रोटीन लें।