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मातृत्व हर महिला के जीवन का एक अनमोल और खास अनुभव होता है। लेकिन जब शिशु गर्भावस्था के 37वें हफ्ते से पहले जन्म लेता है, तो इसे समय से पहले डिलीवरी या प्रीटर्म डिलीवरी कहा जाता है। यह स्थिति मां और नवजात दोनों के लिए गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकती है। हालांकि, समय रहते इसके लक्षणों की पहचान कर ली जाए और उचित उपचार किया जाए, तो इन जटिलताओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इस ब्लॉग में हम विस्तार से जानेंगे कि समय से पहले डिलीवरी क्या होती है, इसके कारण, लक्षण, बचाव के उपाय और उपलब्ध इलाज के विकल्प। साथ ही, यदि आप नोएडा में स्त्री रोग विशेषज्ञ अस्पताल की तलाश में हैं, तो यह जानकारी आपके लिए विशेष रूप से उपयोगी साबित हो सकती है।
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समय से पहले डिलीवरी क्यों होती है? (Why does preterm delivery occur?)
घरेलू और जीवनशैली से जुड़ी सावधानियां (Precautions & lifestyle tips)
लेप्रोस्कोपिक व मिनिमली इनवेसिव गाइडलाइन (Laparoscopic & minimally invasive guidelines)
सामान्यत: गर्भावस्था 37 से 40 हफ्तों तक चलती है। लेकिन यदि शिशु का जन्म 37वें हफ्ते से पहले होता है तो इसे प्रीटर्म डिलीवरी कहते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार प्रीटर्म जन्म नवजात मृत्यु और जटिलताओं का प्रमुख कारण है। ऐसे शिशुओं का वजन अक्सर सामान्य से कम होता है। उनका शारीरिक विकास पूरी तरह नहीं होता है। नतीजतन उन्हें सांस लेने में कठिनाई, पाचन संबंधी समस्याएं और संक्रमण से लड़ने में कमजोरी का सामना करना पड़ता है। कई बार इन बच्चों को विशेष निगरानी और नवजात गहन चिकित्सा इकाई (एनआईसीयू) में भर्ती करना पड़ता है। प्रीटर्म शिशुओं की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है। जिससे उन्हें लंबे समय तक स्वास्थ्य संबंधी देखभाल की जरूरत पड़ती है।
गर्भावस्था के दौरान समय से पहले होने वाले प्रसव को अलग-अलग श्रेणियों में बांटते हैं। सभी स्थितियों में समय पर चिकित्सकीय देखभाल और उचित पोषण बेहद जरूरी है।
यदि शिशु का जन्म 28 हफ्ते से पहले होता है, तो इसे एक्सट्रीमली प्रीटर्म कहते हैं। ऐसे बच्चों को सबसे ज्यादा जटिलताओं का सामना करना पड़ता है।
28 से 32 हफ्ते के बीच जन्म लेने वाले शिशुओं को वेरी प्रीटर्म की श्रेणी में रखते हैं। जिनमें अंगों का विकास अधूरा होता है। उन्हें विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है। स्त्री रोग विशेषज्ञ नोएडा
32 से 34 हफ्तों के बीच होने वाला जन्म मॉडरेट प्रीटर्म कहते हैं। जहां बच्चे का विकास अपेक्षाकृत बेहतर होता है लेकिन फिर भी कई बार सांस और पाचन से जुड़ी समस्याएं बनी रहती हैं।
34 से 37 हफ्तों के बीच जन्म लेने वाले शिशुओं को लेट प्रीटर्म कहते हैं। ऐसे शिशु पूर्ण विकसित बच्चों के करीब होते हैं, लेकिन फिर भी वजन सामान्य से कम होने या संक्रमण का खतरा रहता है।
गर्भाशय या गर्भाशय ग्रीवा की कमजोरी।
योनि या गर्भाशय में संक्रमण।
जुड़वा या ट्रिपल प्रेग्नेंसी (मल्टीपल प्रेग्नेंसी)।
गर्भाशय की संरचना में असामान्यता।
प्लेसेंटा से जुड़ी समस्याएं (जैसे प्लेसेंटा प्रिविया या प्लेसेंटा अब्रप्शन)।
हार्मोनल असंतुलन।
जीवनशैली संबंधी कारण यानी धूम्रपान, शराब, तनाव और पोषण की कमी।
पुरानी बीमारियां यानी डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, थायरॉयड आदि।
पहले प्रीटर्म डिलीवरी का इतिहास होना।
मां की उम्र बहुत कम (18 वर्ष से कम) या अधिक (35 वर्ष से ऊपर) होना
गर्भावस्था के दौरान यदि कुछ असामान्य लक्षण दिखाई दें तो यह समय से पहले डिलीवरी का संकेत होता है। इन संकेतों को समय पर पहचानना बेहद जरूरी है, ताकि तुरंत स्त्री रोग विशेषज्ञ नोएडा से संपर्क किया जा सके और मां व बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
गर्भाशय का बार-बार और नियमित अंतराल पर सख्त होना या दर्द महसूस होना।
सामान्य दर्द की तुलना में यह ज्यादा समय तक बना रहता है और आराम करने पर भी कम नहीं होता।
अगर झिल्ली फट जाए तो एम्नियोटिक फ्लूइड बाहर निकलने लगता है, जो समय से पहले प्रसव का संकेत है। स्त्री रोग विशेषज्ञ नोएडा
हल्का-सा खून या असामान्य डिस्चार्ज भी चेतावनी का संकेत होता है।
अचानक और असामान्य रूप से पेशाब की बार-बार आवश्यकता महसूस होना।
गर्भ में बच्चे की हलचल सामान्य से कम होना या बंद हो जाना गंभीर लक्षण होता है।
गर्भावस्था के दौरान मां और शिशु दोनों के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए संतुलित और पौष्टिक आहार लेना बेहद आवश्यक है।
आहार में हरी सब्जियां, मौसमी फल, दूध, दालें और साबुत अनाज शामिल करने चाहिए। जिससे शरीर को सभी आवश्यक पोषक तत्व मिल सकें।
धूम्रपान, शराब और किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थ से पूरी तरह परहेज करना जरूरी है। क्योंकि यह सीधे बच्चे के विकास पर नकारात्मक असर डालते हैं।
गर्भवती महिला को पर्याप्त आराम करना चाहिए और तनाव से बचने का प्रयास करना चाहिए। जिससे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर बना रहे।
नियमित रूप से गर्भावस्था की जांच कराना भी जरूरी है। जिससे मां और बच्चे की स्थिति की निगरानी हो सके और समय रहते किसी भी जटिलता का पता लगाया जा सके।
व्यक्तिगत हाइजीन और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। डॉक्टर की सलाह के बिना कोई भी दवा नहीं लेनी चाहिए, ताकि गर्भावस्था सुरक्षित और स्वस्थ बनी रहे।
टोकॉलिटिक्स दवाएं: गर्भाशय की मांसपेशियों को रिलैक्स कर समय से पहले संकुचन को रोकती हैं। नोएडा में स्त्री रोग विशेषज्ञ अस्पताल
एंटीबायोटिक्स: संक्रमण की स्थिति में दी जाती हैं ताकि जटिलताओं से बचा जा सके।
स्टेरॉइड इंजेक्शन: शिशु के फेफड़ों के विकास को तेज करते हैं और जन्म के बाद सांस लेने की क्षमता बढ़ाते हैं।
सर्वाइकल सर्क्लाज: गर्भाशय ग्रीवा कमजोर होने पर सर्जिकल टांके लगाकर उसे मजबूत किया जाता है।
बेड रेस्ट और निगरानी: हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी में आराम और नियमित जांच की सलाह दी जाती है।
निरंतर मॉनिटरिंग: डॉक्टर स्थिति पर समय-समय पर नजर रखते हैं ताकि समस्या बढ़ने से रोकी जा सके।
आधुनिक तकनीक: सुरक्षित, प्रभावी और अपेक्षाकृत कम दर्द देने वाली।
छोटे चीरे: बड़े चीरे की जगह छोटे-छोटे चीरे लगाए जाते हैं।
कम तकलीफ: मरीज को सर्जरी के बाद कम दर्द और परेशानी होती है।
जल्दी रिकवरी: सर्जरी के बाद रोगी जल्दी स्वस्थ होकर सामान्य जीवन में लौट सकती है। नोएडा में स्त्री रोग विशेषज्ञ अस्पताल
कम ब्लड लॉस: रक्त की हानि बहुत कम होती है, जिससे जटिलताओं का खतरा घटता है।
कम अस्पताल में भर्ती: लंबे समय तक अस्पताल में रहने की जरूरत नहीं होती।
37वें हफ्ते से पहले पेट में दर्द या संकुचन प्रीटर्म लेबर का संकेत है।
पानी की थैली फटना यानी संक्रमण का खतरा होता है। इसलिए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
योनि से खून आना या अधिक डिस्चार्ज होना जटिलताओं का संकेत।
गर्भावस्था में तेज बुखार, ठंड लगना या संक्रमण के लक्षण तो तुरंत जांच कराएं। नोएडा में स्त्री रोग विशेषज्ञ अस्पताल
शिशु की हलचल सामान्य से कम महसूस होने पर तुरंत डॉक्टर से मिलें।
समय पर चिकित्सकीय देखभाल मां और बच्चे दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करती है
प्रीटर्म बच्चों को जन्म के बाद अक्सर एनआईसीयू (नवजात गहन देखभाल इकाई) में रखा जाता है।
यहां उन्हें सांस लेने, शरीर का तापमान नियंत्रित करने और संक्रमण से बचाने के लिए विशेष चिकित्सा सहायता मिलती है।
ऐसे शिशुओं के लिए मां का ब्रेस्टमिल्क बेहद जरूरी होता है, जो पोषण, एंटीबॉडी और सुरक्षा प्रदान करता है। नोएडा में स्त्री रोग विशेषज्ञ अस्पताल
मां को पर्याप्त पोषण और आराम लेना चाहिए ताकि दूध की गुणवत्ता और मात्रा बनी रहे।
संक्रमण से बचाव के लिए बच्चे और मां दोनों की स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
डॉक्टर के निर्देशानुसार नियमित फॉलोअप कराना चाहिए, ताकि बच्चे की वृद्धि, स्वास्थ्य और विकास की निगरानी हो सके।
किसी भी समस्या का समय पर उपचार सुनिश्चित किया जा सके।
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समय से पहले डिलीवरी एक गंभीर समस्या है। यह कई बार रोकी जा सकती है। गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच, संतुलित आहार, तनावमुक्त जीवनशैली और डॉक्टर की सलाह का पालन जरूरी है। धूम्रपान, शराब और नशीले पदार्थों से बचकर और पर्याप्त आराम लेकर जोखिम को कम करते हैं। अगर समय पर सही उपचार और निगरानी मिल जाए तो मां और शिशु दोनों को जटिलता को बचा सकते हैं। सही सावधानियां और चिकित्सा देखभाल प्रीटर्म डिलीवरी के खतरे को घटाकर एक सुरक्षित और स्वस्थ गर्भावस्था सुनिश्चित करती हैं। नोएडा में स्त्री रोग विशेषज्ञ अस्पताल।
प्रश्न 1: समय से पहले डिलीवरी क्यों होती है?
उत्तर: संक्रमण, गर्भाशय की कमजोरी, बहु-गर्भावस्था, प्लेसेंटा की समस्या या लाइफस्टाइल फैक्टर इसकी वजह बनते हैं।
प्रश्न 2: क्या प्रीटर्म बच्चे स्वस्थ जीवन जी सकते हैं?
उत्तर: हां, सही समय पर इलाज और देखभाल मिलने पर प्रीटर्म बच्चे भी सामान्य जीवन जीना आसाना होता है।
प्रश्न 3: क्या समय से पहले डिलीवरी को रोका जा सकता है?
उत्तर: हां नियमित चेकअप, पोषण, दवाओं और सर्जरी (यदि जरूरत हो) से इसे काफी हद तक रोक सकते हैं।
प्रश्न 4: प्रीटर्म बच्चे को एनआईसीयू में कितने दिन रखना पड़ता है?
उत्तर: यह बच्चे के जन्म के समय की उम्र, वजन और स्वास्थ्य पर निर्भर करता है।