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सर्दियों में बच्चों में अस्थमा अटैक आम है। यह समय पर सही पहचान और इलाज के बिना गंभीर समस्या बनता है। बच्चों में अस्थमा अटैक के कारण, लक्षण और नियंत्रण के उपाय जानना माता-पिता के लिए आवश्यक है। नोएडा में बाल रोग हृदय रोग विशेषज्ञ (Pediatric cardiologist in Noida) उपलब्ध है। नोएडा में बच्चों के अस्थमा और श्वसन स्वास्थ्य के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध हैं। समय पर इलाज से बच्चों को पूरी तरह स्वस्थ किया जाता है।
बच्चों की जांच या इलाज के लिए संपर्क करें: +91 9667064100
ठंडी हवा, कम ह्यूमिडिटी और सर्दियों में वायरल संक्रमण बच्चों में अस्थमा अटैक को बढ़ाते हैं। छोटे बच्चों और नवजात में फेफड़ों और इम्यूनिटी का कमजोर होना अटैक की गंभीरता बढ़ाता है। ठंडी हवा श्वसन मार्ग को सिकोड़ देती है। जिससे सांस लेने में कठिनाई होती है। लक्षण दिखने पर इलाज कराना चाहिए।
धूल, धुआं, पालतू जानवर, सर्दियों में हवा में एलर्जन अस्थमा अटैक को बढ़ाते हैं।
ठंडी हवा फेफड़ों की नलियों को सिकोड़ देती है, जिससे श्वसन कठिन होता है।
सर्दियों में वायरल संक्रमण, जैसे राइनोवायरस और इन्फ्लूएंजा, अस्थमा अटैक (Asthma attack) का कारण बनते हैं।
धुआं, कोहरा, इंडोर स्मोक और प्रदूषण अस्थमा को बढ़ाते हैं।
बार-बार बीमार होने वाले या जन्मजात रोग वाले बच्चे ज्यादा अस्थमा अटैक का शिकार होते हैं।
तेज या मुश्किल से सांस लेना
सीने में दबाव या दर्द
जोर से खांसी, खासकर रात और सुबह
सांस लेने में सीटी जैसी आवाज (Wheeze)
थकान, भूख में कमी या नींद में बदलाव
बच्चों में अस्थमा अटैक की समय पर पहचान बहुत जरूरी है, क्योंकि देर होने पर यह जानलेवा भी हो सकता है। अस्थमा अटैक के दौरान बच्चे के फेफड़ों की नलियां सिकुड़ जाती हैं।
सबसे पहले सांस की गति और स्थिति पर ध्यान दें। यदि बच्चा सामान्य से तेज सांस ले रहा हो, सांस लेते समय सीने में जोर लग रहा हो, सांस रुक-रुक कर आ रही हो या बच्चा बोलते समय हांफने लगे, तो यह अस्थमा अटैक का संकेत हो सकता है। नोएडा में सर्वश्रेष्ठ बाल चिकित्सालय (Best pediatric hospital in Noida) है। छोटे बच्चों में नाक के पंखों का फड़कना, पसलियों या गर्दन की मांसपेशियों का अंदर की ओर खिंचना भी गंभीर चेतावनी मानी जाती है। ऐसी स्थिति में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
पल्स ऑक्सीमीटर की मदद से बच्चे के शरीर में ऑक्सीजन स्तर की जांच की जाती है। सामान्य स्थिति में ऑक्सीजन स्तर 95–100% रहता है, लेकिन यदि यह 94 % से नीचे गिर जाए तो यह दर्शाता है कि फेफड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल रही है। यह अस्थमा अटैक की गंभीर अवस्था हो सकती है और इसमें तत्काल इलाज की आवश्यकता होती है।
शारीरिक जांच के दौरान डॉक्टर स्टेथोस्कोप से बच्चे के फेफड़ों की आवाज सुनते हैं। सांस लेते या छोड़ते समय सीटी जैसी आवाज अस्थमा की प्रमुख पहचान होती है। कुछ मामलों में फेफड़ों के किसी हिस्से में आवाज कम या बिल्कुल न सुनाई देना भी गंभीर अवरोध का संकेत हो सकता है। डॉक्टर बच्चे के सीने की गति, सांस की गहराई और थकान के लक्षणों का भी मूल्यांकन करते हैं।
अगर अस्थमा अटैक बार-बार हो रहा हो या बहुत गंभीर हो, तो एक्स-रे (X-ray) और फेफड़ों की अन्य जांच की सलाह दी जाती है। इससे यह पता लगाया जाता है कि कहीं फेफड़ों में संक्रमण (Lung infection), सूजन, हवा का फंसना या कोई अन्य जटिल समस्या तो नहीं है। यह जांच खासतौर पर तब जरूरी होती है जब बच्चा दवाओं से ठीक न हो रहा हो या रात में सांस की समस्या बढ़ जाती हो।
स्पाइरोमेट्री (Spirometry): फेफड़ों की कार्यक्षमता मापने के लिए होता है।
एलर्जी टेस्ट (Allergy test): एलर्जन पहचानने के लिए होता है।
ब्लड टेस्ट (Blood test): संक्रमण या इम्यूनिटी जांच के लिए होता है।
पल्स ऑक्सीमेट्री (Pulse oximetry): ऑक्सीजन संतुलन मॉनिटर करने के लिए होता है।
बच्चों में अस्थमा अटैक का इलाज उसकी गंभीरता पर निर्भर करता है। समय पर सही इलाज न मिलने पर सांस की समस्या बढ़ सकती है। नोएडा में सर्वश्रेष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ (Best pediatricians in Noida) है। इसलिए अटैक के दौरान तुरंत राहत, लंबे समय का नियंत्रण और गंभीर स्थिति में अस्पताल उपचार तीनों बेहद जरूरी होते हैं।
अस्थमा अटैक शुरू होते ही सबसे पहले डॉक्टर द्वारा निर्धारित इंहेलर (ब्रॉन्कोडायलेटर) का उपयोग करना चाहिए। यह दवा फेफड़ों की संकरी नलियों को खोलने में मदद करती है और सांस लेने में तुरंत राहत देती है। इंहेलर हमेशा सही तकनीक और डॉक्टर के निर्देश अनुसार ही देना चाहिए, ताकि दवा सीधे फेफड़ों तक पहुंचे। अगर अटैक तेज हो और बच्चे को सांस लेने में ज्यादा परेशानी हो रही हो, तो ऑक्सीजन सपोर्ट की आवश्यकता पड़ सकती है। ऑक्सीजन की कमी होने पर शरीर के अंगों पर बुरा असर पड़ सकता है, इसलिए ऐसी स्थिति को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
बार-बार होने वाले अस्थमा अटैक को रोकने के लिए दीर्घकालिक नियंत्रण बहुत जरूरी होता है। इसके लिए डॉक्टर की सलाह से इनहेलर और नेबुलाइजर का नियमित उपयोग कराया जाता है। जिससे फेफड़ों की सूजन कम होती है और सांस की नलियां खुली रहती हैं। कुछ बच्चों में सूजन को नियंत्रित करने के लिए स्टीरॉइड दवाएं दी जाती हैं। यह दवाएं डरने वाली नहीं होतीं है। अगर इन्हें सही मात्रा और डॉक्टर की निगरानी में दिया जाए। इनका उद्देश्य अटैक की आवृत्ति और गंभीरता को कम करना होता है। ट्रिगर नियंत्रण भी अस्थमा मैनेजमेंट का अहम हिस्सा है। धूल, धुआं, प्रदूषण, ठंडी हवा, पालतू जानवरों के बाल और एलर्जी पैदा करने वाली चीजों से बच्चे को दूर रखना चाहिए। घर को साफ, हवादार और धूम्रपान-मुक्त रखना जरूरी है।
अगर बच्चे को बार-बार उल्टी, बहुत तेज सांस, बोलने में कठिनाई या होंठ और नाखून नीले पड़ने जैसे लक्षण दिखें, तो यह गंभीर अस्थमा अटैक का संकेत है। ऐसी स्थिति में समय गंवाए बिना बच्चे को तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए। अस्पताल में बच्चे को इंट्रावेनस (आईवी) दवाएं, फ्लुइड, नेबुलाइजेशन और लगातार निगरानी दी जाती है। जरूरत पड़ने पर ऑक्सीजन (Oxygen) या अन्य एडवांस्ड सपोर्ट भी दिया जा सकता है। समय पर अस्पताल पहुंचने से गंभीर जटिलताओं और जान के खतरे को टाला जा सकता है।
हाथ और चेहरे की सफाई।
ठंडी हवा में बाहर कम समय बिताना।
धुआं, कोहरा और प्रदूषण से बचाव।
घर को हवादार और साफ रखें।
समय पर टीकाकरण (इन्फ्लूएंजा, डीपीटी आदि)।
स्वस्थ आहार: विटामिन सी, डी, जिंक युक्त।
जंक फूड, बहुत ठंडी या मीठी चीजें कम दें।
बच्चों में अस्थमा या सांस से जुड़ी समस्या के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर सबसे पहले पीडियाट्रिशियन से संपर्क करना चाहिए। क्योंकि वह हल्के अटैक और सामान्य जांच-इलाज में मार्गदर्शन करते हैं। यदि बच्चे को बार-बार अस्थमा अटैक आ रहा हो या समस्या गंभीर होती जा रही हो, तो पीडियाट्रिक पल्मोनोलॉजिस्ट (Pediatric pulmonologist in noida) से दिखाना जरूरी होता है, जो बच्चों के फेफड़ों और श्वसन रोगों के विशेषज्ञ होते हैं। वहीं, नवजात शिशु में अगर सांस लेने में गंभीर परेशानी हो, तो बिना देरी किए नियोनेटोलॉजिस्ट की सलाह लेना आवश्यक है।
नोएडा में बच्चों के अस्थमा विशेषज्ञ से अपॉइंटमेंट के लिए कॉल करें: +91 9667064100
सर्दियों में बच्चों में अस्थमा अटैक आम है। लेकिन समय पर पहचान और इलाज जरूरी है। माता-पिता को बच्चों की सांस, खांसी, नींद और भूख पर ध्यान देना चाहिए। विशेषज्ञ की सलाह और उचित इलाज से बच्चे पूरी तरह स्वस्थ हो सकते हैं। इलाज में देरी नहीं करनी चाहिए। ऐसा करने से जीवन खतरे में पड़ सकता है।
प्रश्न 1: क्या नवजात में अस्थमा हो सकता है?
उत्तर: हां, जन्मजात श्वसन समस्याओं और कमजोर इम्यूनिटी से होता है। इसलिए जांच के बाद इलाज कराना चाहिए।
प्रश्न 2: बच्चों में अस्थमा अटैक का इलाज संभव है?
उत्तर: हां, इंहेलर, दवा और ट्रिगर नियंत्रण से पूरी तरह नियंत्रित किया जाता है। डॉक्टर की सलाह पर दवा और इलाज कराना चाहिए।
प्रश्न 3: रात में अस्थमा अटैक क्यों बढ़ता है?
उत्तर: ठंडी हवा और रात में एलर्जी के कारण सांस लेने में कठिनाई और खांसी बढ़ती है। इसलिए ठंड से बचाव का उपाय करना चाहिए।
प्रश्न 4: क्या टीकाकरण से अस्थमा अटैक कम होता है?
उत्तर: हां, इन्फ्लूएंजा और डीपीटी टीके संक्रमण को रोककर अटैक कम करते हैं। इसलिए टीका लगवाना चाहिए।
प्रश्न 5: बच्चे के अटैक में क्या तुरंत करें?
उत्तर: डॉक्टर द्वारा निर्धारित इंहेलर, बच्चे को शांत रखें और तेज अटैक में तुरंत अस्पताल जाएं। इलाज में देरी नहीं करनी चाहिए।