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लिवर शरीर का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण अंग है। यह खाना पचाने, ऊर्जा बनाने, विषैले पदार्थों को बाहर निकालने, हार्मोन्स और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने में मदद करता है। अक्सर लिवर की समस्या बिना किसी स्पष्ट लक्षण के बढ़ती है। इसलिए इसे साइलेंट हीरो कहते हैं। नोएडा में सर्वश्रेष्ठ लिवर अस्पताल उपलब्ध है (Best Liver Hospital Available in Noida)। अनुभवी गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉक्टर से समय पर परामर्श लेना लिवर रोग की गंभीरता को रोकने के लिए बहुत जरूरी है।
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हेपेटाइटिस वायरस के संक्रमण से लिवर में सूजन और क्षति होती है। यह संक्रमण संक्रमित रक्त, सुई, असुरक्षित यौन संबंध या संक्रमित मां से बच्चे में फैलाता है। लम्बे समय तक रहने वाला हेपेटाइटिस क्रोनिक लिवर डिजीज या सिरोसिस (Cirrhosis) में बदलता है। समय पर टीकाकरण और सुरक्षित व्यवहार अपनाकर इससे बचाव संभव है।
जब लिवर में अत्यधिक मात्रा में वसा (Fat) जमा हो जाती है तो यह स्थिति उत्पन्न होती है। अधिक वजन, मोटापा, शारीरिक निष्क्रियता, हाई फैट या प्रोसेस्ड डाइट, और शुगर का अधिक सेवन मुख्य कारण है । इसके दो प्रकार होते हैं। पहला नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज होता है। यह शराब न पीने वालों में भी होता है। वहीं दूसरा अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज (fatty liver disease) होता है, जो अत्यधिक शराब सेवन से होता है। इसके लक्षण शुरुआती अवस्था में नहीं दिखते। पर समय के साथ थकान, पेट में भारीपन और लिवर एंजाइम्स में वृद्धि देखी जाती है।
लम्बे समय तक और अत्यधिक मात्रा में शराब का सेवन करने से लिवर की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। प्रारंभिक अवस्था में फैटी लिवर, बाद में हेपेटाइटिस, और अंततः सिरोसिस या लिवर फेल्योर (liver failure) हो सकता है। इस रोग से बचाव का सबसे अच्छा तरीका शराब का पूर्ण परहेज है।
कुछ दवाएं जैसे पेनकिलर्स का अत्यधिक उपयोग, एंटीबायोटिक्स, स्टेरॉयड, और कुछ हर्बल सप्लिमेंट्स लिवर को नुकसान पहुंचाती हैं। लंबे समय तक बिना चिकित्सकीय सलाह के दवा लेना खतरनाक होता है। दवाओं के सेवन से पहले डॉक्टर की सलाह अवश्य लें। लिवर फंक्शन टेस्ट (एलएफटी) नियमित रूप से कराते रहें।
इस स्थिति में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से लिवर की कोशिकाओं पर हमला करती है। इससे लिवर में सूजन, स्कारिंग और धीरे-धीरे कार्यक्षमता में कमी आती है। इसके प्रमुख रूप ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस, प्राइमरी बाइलरी सिरोसिस, और प्राइमरी स्क्लेरोजिंग कोलांगाइटिस है। इलाज में इम्यूनो-सप्रेसिव दवाओं का उपयोग किया जाता है ताकि लिवर की क्षति को रोका जा सके।
कुछ लोगों में लिवर रोग पीढ़ियों से चले आ रहे आनुवांशिक विकारों के कारण होते हैं। जैसे कॉपर का अत्यधिक जमाव, आयरन की अधिकता), अल्फा-1 एंटीट्रिप्सिन की कमी से। मामलों में समय रहते जांच और जेनेटिक काउंसलिंग से स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है।
लिवर के कमजोर होने पर शरीर में विषाक्त पदार्थ जमा होते हैं। यह मस्तिष्क और मांसपेशियों पर प्रभाव डालते हैं। जिससे लगातार थकान, नींद न आना और सुस्ती महसूस होती है। कई बार यह थकान इतना बढ़ती है कि व्यक्ति सामान्य कामकाज करने में भी कठिनाई महसूस करता है।
त्वचा, आंखों की सफेदी और नाखूनों का पीला होना लिवर रोग का सबसे स्पष्ट लक्षण है। इसका कारण है लिवर में बिलीरुबिन नामक पिगमेंट का बढ़ जाना, जिसे लिवर सामान्य रूप से बाहर नहीं निकाल पाता है। यह स्थिति हेपेटाइटिस, सिरोसिस या पित्त नली में अवरोध की ओर इशारा करती है।
दाईं तरफ ऊपरी पेट में दर्द, जलन या सूजन का एहसास लिवर की सूजन का संकेत होता है। यह दर्द फैटी लिवर, लिवर संक्रमण या गांठ के कारण होता है। कभी-कभी पेट फूलने या गैस बनने के रूप में भी यह महसूस होता है।
लिवर जब ठीक से पित्त नहीं बना पाता, तो पाचन प्रभावित होता है। इससे जी मिचलाना, उल्टी, पेट में जलन और भूख की कमी जैसे लक्षण दिखते हैं। यह खासकर हेपेटाइटिस (Hepatitis) या दवाओं के असर से हुए लिवर डैमेज में आम है।
जब लिवर बिलीरुबिन को ठीक से संसाधित नहीं कर पाता, तो यह मूत्र में चला जाता है, जिससे मूत्र गहरा पीला या भूरा दिखता है। वहीं पित्त के प्रवाह में कमी से मल का रंग हल्का या सफेद होता है। यह परिवर्तन अक्सर जॉन्डिस या पित्त नली में रुकावट का संकेत देता है।
लिवर की कार्यक्षमता घटने पर शरीर ऊर्जा संतुलन बनाए नहीं रख पाता। इससे धीरे-धीरे भूख कम हो जाती है, वजन घटता है और शरीर दुर्बल होता है। लंबे समय तक भूख न लगना सिरोसिस या कैंसर जैसी गंभीर अवस्था का संकेत भी होता है।
लिवर के कमजोर होने पर त्वचा के नीचे पित्त लवण (bile salts) जमा हो जाते हैं, जिससे खुजली होती है। यह खुजली अक्सर रात में या बिना किसी स्पष्ट कारण के होती है। कुछ मामलों में त्वचा पर लाल या भूरे धब्बे और छोटे-छोटे चकत्ते भी दिखाई देते हैं।
एलएफटी:
यह सबसे बेसिक और महत्वपूर्ण जांच है जो लिवर की कार्यक्षमता को मापती है। इसमें एंजाइम (एसजीपीटी, एसजीओटी, एएलपी), प्रोटीन (एल्ब्यूमिन, ग्लोब्युलिन) और बिलीरुबिन का स्तर देखा जाता है। परिणाम यह बताते हैं कि लिवर में सूजन, संक्रमण या किसी दवा/शराब का असर तो नहीं है। सामान्य रूप से हर 6 से 12 महीने में एक बार एलएफटी करवाना लाभदायक रहता है। खासकर जोखिम वाले व्यक्तियों के लिए।
यूएसजी-अल्ट्रासाउंड एब्डॉमेन:
यह एक नॉन-इनवेसिव और दर्द रहित जांच है जो लिवर के आकार, बनावट और घनत्व की जानकारी देती है। इससे फैटी लिवर, सूजन (Inflammation), गांठ (Mass/Tumor) या सिरोसिस जैसी स्थिति का प्रारंभिक पता लगाया जाता है। डॉक्टर अक्सर इसे शुरुआती स्क्रीनिंग जांच के रूप में सलाह देते हैं।
फाइब्रोस्कैन:
यह आधुनिक तकनीक लिवर की कठोरता) को नॉन-इनवेसिव तरीके से मापती है। इसका उपयोग सिरोसिस या क्रोनिक लिवर डिजीज की गंभीरता जानने में किया जाता है। यह जांच विशेष रूप से उन मरीजों के लिए होती है जिनमें हेपेटाइटिस बी/सी या फैटी लिवर की पुरानी समस्या है। इसका फायदा यह है कि इसमें किसी सुई या बायोप्सी की जरूरत नहीं होती।
एचबीवी और एचसीवी टेस्ट:
यह टेस्ट हेपेटाइटिस बी और सी वायरस के संक्रमण की पहचान के लिए किए जाते हैं। HBsAg, एंटी-HCV एंटीबॉडी जैसी जांचों से यह पता चलता है कि व्यक्ति संक्रमित है या नहीं। इन वायरस से होने वाले संक्रमण अक्सर लिवर को धीरे-धीरे नुकसान पहुँचाते हैं, इसलिए समय पर पहचान अत्यंत आवश्यक है। अगर परिणाम पॉज़िटिव आएं तो आगे की जाँच और उपचार तुरंत शुरू करना चाहिए।
सीटी स्कैन/ एमआरआई/ बायोप्सी:
जब अल्ट्रासाउंड या एलएफटी में गंभीर गड़बड़ी दिखाई दे, तो इन एडवांस जांचों की जरूरत पड़ती है। सीटी स्कैन और एमआरआई लिवर की आंतरिक संरचना, ट्यूमर, रक्त प्रवाह या कैंसर जैसी जटिलताओं का स्पष्ट चित्र देते हैं। लिवर बायोप्सी (Liver biopsy) में सूक्ष्म ऊतक लेकर माइक्रोस्कोप से जांच की जाती है, जिससे बीमारी की सटीक अवस्था और कारण ज्ञात होता है। यह जांच तब की जाती है जब रोग की पुष्टि या स्टेजिंग ज़रूरी हो।
त्वचा या आंखों का पीलापन।
पेट में असामान्य दर्द या सूजन।
बार-बार उल्टी, मल या पेशाब में बदलाव।
अचानक वजन घटना, लगातार थकान।
दवाइयां:
दवाओं का उपयोग संक्रमण, सूजन या वायरल प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। हेपेटाइटिस बी और सी के मामलों में एंटीवायरल दवाएं दी जाती हैं, जो वायरस को बढ़ने से रोकती हैं। नोएडा में गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉक्टर उपलब्ध है (Gastroenterologist Doctors Available in Noida)। सूजन और इम्यून सिस्टम से संबंधित लिवर रोगों में इम्यूनो-सप्रेसिव दवाओं का उपयोग किया जाता है। डॉक्टर द्वारा बताए गए समय और मात्रा में ही दवाइयां लें। स्वयं-उपचार से लिवर और कमजोर हो सकता है। साथ ही कुछ दवाओं का अधिक उपयोग जैसे पेनकिलर या स्टेरॉयड लिवर को नुकसान पहुँचा सकते हैं, इसलिए डॉक्टर की सलाह अनिवार्य है।
संतुलित आहार: फलों, हरी सब्जियों, साबुत अनाज और प्रोटीनयुक्त भोजन का सेवन करें।
शराब से परहेज: शराब लिवर की कोशिकाओं को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाती है। इसलिए पूर्ण रूप से परहेज जरूरी है।
वजन नियंत्रण: मोटापा फैटी लिवर का मुख्य कारण है; इसलिए कैलोरी नियंत्रित डाइट अपनाएं।
पर्याप्त पानी: डिटॉक्सिफिकेशन के लिए प्रतिदिन पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं।
धूम्रपान और जंक फूड से बचें: ये दोनों लिवर की कार्यक्षमता पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।
नियमित व्यायाम:
हल्का कार्डियो, योग और तेज चलना लिवर स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हैं। व्यायाम से ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है, वजन नियंत्रित रहता है और फैटी लिवर की समस्या घटती है। प्रतिदिन कम से कम 30 मिनट की शारीरिक गतिविधि (ब्रिस्क वॉक, साइक्लिंग, योगासन आदि) लिवर को स्वस्थ बनाए रखती है। तनाव भी लिवर स्वास्थ्य पर असर डालता है। इसलिए ध्यान और पर्याप्त नींद लेना जरूरी है।
सर्जरी या ट्रांसप्लांट:
जब लिवर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाए या सिरोसिस की अवस्था में पहुंच जाए, तो लिवर ट्रांसप्लांट ही विकल्प बचता है। ट्रांसप्लांट में बीमार लिवर को स्वस्थ डोनर लिवर से बदला जाता है। कुछ मामलों में ट्यूमर, सिस्ट या पित्त नली के अवरोध को हटाने के लिए सर्जरी की जाती है। यह जटिल प्रक्रिया होती है, परंतु अनुभवी सर्जनों और आधुनिक तकनीक से सफलता दर अब काफी बेहतर हो चुकी है।
समय पर उपचार का महत्व:
लिवर रोग अक्सर धीरे-धीरे बढ़ते हैं और प्रारंभ में गंभीर नहीं लगते है। लेकिन इलाज में देरी से सिरोसिस, लिवर फेल्योर या कैंसर जैसी जटिल स्थितियाँ विकसित होती हैं। इसलिए शुरुआती लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेना आवश्यक है। समय पर इलाज न केवल लिवर को बचाता है बल्कि जीवन की गुणवत्ता को भी बेहतर बनाता है।
लिवर रोग अक्सर बिना लक्षण के बढ़ता है। थकान, जॉन्डिस, पेट दर्द, उल्टी, गहरे रंग का पेशाब, वजन घटना या खुजली जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत जांच और उपचार कराएं। समय पर डॉक्टर से सलाह लेने से लिवर बचाया जा सकता है। भविष्य में होने वाली जटिलताओं से बचाता है।
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प्रश्न 1: लिवर की जांच कब करानी चाहिए?
उत्तर: थकान, पीलापन, पेट दर्द, उल्टी या अचानक वजन घटने पर तुरंत पर लिवर की जांच करानी चाहिए।
प्रश्न 2: एलएफटी क्या बताता है?
उत्तर: लिवर के एंजाइम, प्रोटीन और बिलीरुबिन की मात्रा को बताता है।
प्रश्न 3 : क्या हर लिवर रोग में जॉन्डिस आता है?
उत्तर : नहीं, शुरुआती स्टेज में फैटी लिवर या हेपेटाइटिस में जॉन्डिस नहीं भी होता है।
प्रश्न 4: क्या अल्ट्रासाउंड से लिवर रोग पता चलता है?
उत्तर: हां, आकार, बनावट, सूजन, गांठ या फैटी लिवर का पता चलता है। इसलिए अल्ट्रासाउंड जांच करा सकते हैं।
प्रश्न 5: अगर टेस्ट में गड़बड़ी निकले तो क्या करें?
उत्तर: डॉक्टर से मिलें। कारण जानें और उसी आधार पर उपचार शुरू करें। बिना डॉक्टर की सलाह पर उपचार नहीं कराना चाहिए।